चीन के बग़ावत के दिनों  में ऑर्थोडॉक्स शहीदों की जीवन

चीन के बग़ावत के दिनों  में ऑर्थोडॉक्स शहीदों की जीव
हे भगवान् , हम इतनी जल्दी मर जाएंगे… उदास और निराशा से  भरी हुई आवाज़ में  तत्याना बोली। ज़ि चुन  अपनी पत्नी पर स्नेहपूर्वक दृष्टि दौड़ाई  और गहरी सांस लेकर उत्तर में कुछ भी बोल नहीं पाया।  पिछले कई  दिनों  में  उसके गाल पिचक  गहरे हो   गए ,  अत्यंत सुन्दर महिला चिंता और भय से  बिलकुल  बूढी हो चली  ,  माथे  पर लम्बी और गहरी झुर्रियों ने  उसके चेहरे को कुरूप बना दी हैं, नेत्रों में जीवन की अग्नि  भी बूझ गयी।  
तुम तो अच्छी तरह जानती हो  कि  इस धरती पर हर प्राणी  मरणशील   है और आनेवाली मृत्यु से कोई भी नहीं बच सकता। हम सभी को एक दिन मृत्यु का स्वाद चखना पड़ेगा।    
वह इसे दिलासा दे रहा था ताकि उसे चिंता न हो। परेशानी से उसकी तबियत बिगाड़ती जाती है लेकिनउसने    पति  को इशारे से रोक दिया ।  
तत्याना बोली कि हमारी मृत्यु का स्वाद कड़वा होगा , और उसकी आवाज़ में लाचारी थी।  मर जाएंगे हम,  आज नहीं तो कल ज़रूर मर जाएंगे।  
ज़ि चुन चुप रहा ।
स्त्री ने आँखें  बंद कर ली।  
मैं अपना देश, अपना नगर, लोगों को भी  पहचान नहीं पा रही हूँ।  वास्तव में चीन में क्या हो रहा है।  भाई भाई की हत्या करता है बेटा -बाप को मारते हैं, नाने-दादे अपने पोतों की जान लेते हैं। यह सब क्या हो रहा है, क्यों? हमारे बड़े बेटे की हत्या लोगों के सामने हुई थी , उसने   निर्दोष  मेमने  की तरह अपनी जान उन शैतानों को दी है।  
तत्याना , बात तो सुनो ज़रा, ज़ि चुन ने   अपनी बात आगे बढ़ा दी, लेकिन उसकी बात अनसुनी रह गयी।  
चूँकि तुम एक याजक  हो ,हमारी हत्या एक दिन अवश्य होगी।  उसके मुँह में से आखिरी शब्द निकलते हुए सुनकर ज़ि चुन चौंक पड़ा। शायद ज़िन्दी में पहली बार  अपनी  प्यारी पत्नी की  तरफ से वह उकसाया गया।  

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पत्नी के निकट आकर उसने उसके  कंधे  हिलाये   ताकि उसका तैश उतर जाए।  
उसके हाथों के स्पर्श   से  वह पिघल गयी और होश में आकर बोली: माफ़ करो।  अपना चेहरा छिपाते हुए वह रोने लगी।  
-“माफ़ करो मुझे, माफ़ करो”- वह बोलती रही, बोलती रही ।  
ज़ि चुन उसके सिर , उसके बाल हाथ से  सहलाता रहा और तत्याना रोती रही, रोती  रही।  
तत्याना सच  बोलती थी और वह उसकी दलील से भी सहमत था। वह  एक याजक  , मसीही था और कड़वा सच यह भी था कि उसका परिवार बहुत जल्दी  वेदी पर चढ़ाया  जाएगा।  
जब से बिशप पल्लादी जो उस समय के  समस्त चीन के  मिशन के   प्रमुख थे   ने याजक  का पद प्राप्त ग्रहण   करने का प्रस्ताव रखा था तब से ज़ि चुन शहीद की मौत की अनिवार्यता मासूस करता था।  
 ज़ि चुन के सामने दीक्षा के विषय में एक प्रश्न खड़ा था   क्या तुम अपनी जी यीशु मसीह के नाम पर दे सकते हो ? वह बार बार प्रस्ताव टालता रहा , वह अपनी सफाई के लिए यह बार बार बोलता था कि वह याजक  बनने का योग्य नहीं है। ” मैं  क्षमताहीन और डरपोक मनुष्य हूँ  , अतएव मैं इतना महान पद प्राप्त करने का साहस कैसे   करूँ ?”
किन्तु भगवन की इच्छा मनुष्य की इच्छा से बढ़कर है।  
बिशप निकोलाय ने स्वयं उसे आशीर्वाद दिया। अब से वह याजक  मित्रोफान के नाम से जाना जाता है ।और वह था चीन का पहला ऑर्थोडॉक्स याजक । देश में विद्रोह अकस्मात् आरम्भ हुआ , हालांकि देश की आत्मा में पीड़ा जो थी बहुत समय   से तड़प रही   थी , देश के शरीर पर  के   घाव में से रक्त बहता आ रहा है।  
उस समय यदि गोरों से  किसी का रिश्ता था उन पर सदा देशद्रोह का आरोप निस्संदेह लगाया जाता था और उनकी हत्या अवश्य होती थी।  और देश के सबसे बड़े शत्रु , सबसे खतरनाक दुश्मन मसीही ही थे – उनपर हमेशा धर्मद्रोह का अपराध लगाया जाता  था

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क्योंकि वे सब  चीनी  देव –  देवताओं को त्याग करके तुरंत बाक़ी देशवासियों के लिए शैतान की  औलाद बन जाते थे।  सब  का नसीब  एक  था   -मौत।  
कुछ दिन पहले एक गिरजा घर आस पास में बनाई  ऑर्थोडॉक्स मिशन की सभी  इमारतों समेत जलाया गया था।  
थोड़ी देर में लोगों को ज़िंदा जलाने का वक़्त आएगा, हम सब की बारी आएगी।  
कुछ मिनट के पश्चात , जब तत्याना सिसकना बंद  कर दिया वह बोली :  
-मैं अपनी चिंता नहीं करती हूँ, बिलकुल नहीं करती ,मेरी जीवनयात्रा काफी लम्बी थी , मैं अपनी आँखों से सुख-दुःख, सब कुछ देख चुकीं हूँ- ।  मेरा   कहना है कि  मेरी ज़िन्दगी बहुत अच्छी थी लेकिन, लेकिन मेरे बेटे   का क्या होगा  ।  
-वह मर्द है, वीर है , आनेवाली   यातनाओं को सहने के लिए उसमें बहुत  शक्ति है – दृढ स्वर में   पत्नी को विशवास दिलाते हुए ज़ि चुन बोला।  
– मेरी आशा तो है -तत्याना दो क़दम पीछे रखकर बोली: -“पर उससे यह सब कैसे कहूँ ? उसको तैयार कैसे करूँ ? यह जटिल प्रश्न लम्बे समय तक सता  रहा है। उसकी आवाज़ बीच में रुक गयी और उसकी दयालु आँखें आंसुओं के सागर से भर आई परन्तु अपने को रोककर   दुःख  से भरी  आँखों को आंसू बहाने की अनुमति नहीं दी है।  
-“उसे  यहां बुला लो”-  यह बूढ़े पुजारी  का  हुक्म था-” मैं उससे  रूबरू बात करता हूँ”  .  
तत्याना प्रणाम करके बोली -“आशीर्वाद दे ”  !
उसने बीवी को आशीर्वाद देकर उसे जाने को कहा।
इवान मरिया के साथ दहलीज़ पर बैठा हुआ चावल छांटकर अलग कर रहा था। वह लड़की, मरिया उनके घर अक्सर काफी मदद करने के लिए आया करती थी , वह तो इवान के बड़े भाई  इसाया की मंगेतर थी।  इस मोहल्ले में वह हंसमुख बुलबुल   के नाम से जानी जाती थी , वह सदा मुस्कुराती थी और खिलखिलाकर हंसना उसकी एक अच्छी आदत थी, जो सभी को बहुत पसंद था।  पर आज उसे

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पहचानना बहुत कठिन था, वह बदल गयी।  सिर नीचे करके वह म्लान बैठी थी , चुप थी।  उसका  सुन्दर चेहरा कठोर और गंभीर था।  इवान को आज वह  बहुत डरावना दिख रहा था।  
बिछे हुए सन्नाटे में लड़के ने कहा :-” क्या, यह सच है तुम हमारे पास रहोगी ? “
-हाँ सच तो है  
-क्यों?
-यहीं पर , इसी गिरजा घर के बाज़ू में मेरा जन्म हुआ था , और यहीं  पर मैं इस दुनिया  को   छोड़के चली  जाऊंगी।  
-और हम भी मर जाएंगे?  
मरिया आँखें नीचे करके जवाब में कुछ नहीं बोली।  
-मैं तो जानता हूँ कि  लोगों ने हमारे गिरजे घर  को जला दिया।  
उस वक़्त लड़का परेशानी से कांप   रहा था , उसका चेहरा पीला पड़  गया और आँखों में विशाल भय नज़र आ रहा   था। यहीं पर, इसी मैदान पर सब के सामने इसाया भाई  की हत्या की गयी थी।    
मैं ने सुना है वे लोग हम को शैतान की  औलाद के नाम से पुकारते हैं , बाप रे  
और वे भी हमें मारेंगे ! इवान चिल्ला रहा था।  
मरिया झट से सिर  ऊपर करके कठोरता के साथ बोली:
– ” अरे तू  , कमबख्त, अपनी जुबां मत हिलाओ और ग़ौर  से मेरी बात सुनो ! हम शैतान के बच्चे नहीं हैं! हमारा सच्चा प्रभु  , सच्चा भगवान  है,   हम उस   में  विशवास करते हैं , उसे  अपना खुदा मानते हैं ! “
मुझे तो यह  सब मालूम है। …  

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बालक ने अपना सलीब  निकल लिया और उसे   चुम लिया।  
कुछ देर तक वे दोनों मौन बैठे रहे और  चावल  छांटकर अलग कर रहे थे।  
-” मरिया , बताओ ज़रा , तुम्हें  डर  नहीं लग रहा है ?”- इवान फुसफुसाया।  
-” हाँ, डर  तो बहुत लग रहा है…. ” -वह स्वीकारते हुए बोली।  
-” मुझे भी”
बच्चों के आंसू चावल पर टपक रहे थे… किन्तु न लड़का, न लड़की अपना काम छोड़ते थे।  
उस क्षण तत्याना ली ने प्रवेश करके आदेश दिया : -” इवान , ज़ि चुन तुम्हें अपने पास बुला रहा है। जल्दी चलो ”  !  
लड़का उठ खड़ा हुआ  और प्रणाम करके चल दिया।  
ज़ि चुन खिड़की देख रहा था।  इसी  खिड़की से जले हुए  गिरजाघर, उसके गिरजाघर  का कंकाल नज़र आ रहा था।  मलबा देखने वह दिन में कई बार जाया  करता था , पुरानी यादें  उसे सताती थी। ऐसा लग रहा था जैसेकि  किसी का अदृश्य हाथ  उसे  पकड़कर वहाँ खिंच रहा होगा!   धार्मिक लोगों के बीच में ऐसा   कहा जाता है कि हर गिरजाघर का अपना स्वर्गदूत होता है , और अभी शायद वही स्वर्दूत जले हुए गिरजे के सुलगते कोयले पर बैठकर रो रहा होगा। शायद वह स्वर्दूत ज़ि चुन को अपने पास बुला रहा था , शायद  उन दोनों के मिलने का समय आ गया।  
– “पिता जी , आशीर्वाद दो “- इवान  ने पास आकर प्रणाम किया।  
ज़ि चुन ने बच्चे को आशीर्वाद देकर उसे चुम लिया।  
अब मुझे तुमसे ज़रूरी बात करनी है, समझते हो न, बेटे?
याजक  स्टूल पर बैठ गए और बालक को भी बैठने का इशारा दिया।  

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-तुम्हारी उम्र कितनी है, इवान?
– आठ  
– अब तुम छोटे नहीं हो
याजक बोलने लगा।  
सुनो बेटे,  मैं तुम्हें एक  पुरानी-सी  कहानी सुनानेवाला हूँ।  यह कहानी मेरे नाना सुनाते  थे,  और बाद में  मेरे नाना ने  अपने नाना से सुनाता था। अब आराम से बैठो और जो मैं तुम्हें सुनाऊंगा ध्यान से सुनो,  और बीच में मेरी बात मत काटना, ठीक है?  
पुराने ज़माने में हमारा महान देश बार बार अन्य राष्ट्रों से युद्ध चलाता था। उत्तर के दुश्मन हमारी भूमि  पर हर वर्ष आक्रमण करते थे , सैकड़ों नगर, हज़ारों गाँव जलाते थे और लाखों लोग गुलाम बनाकर  अपने साथ सुदूर जंगली देश  ले जाते थे।  साल ब साल खतरा बढ़ता जा रहा था , सीमाओं की  रक्षा करने के लिए खर्चा भी खूब  बढ़ गया।  हर हुए हमले के बाद नुकसान भी बहुत पहुंचाया जाता था।   लड़ते लड़ते प्रजा थक गयी।  
एक दिन चीनी सम्राट और सेनापति को देश की रक्षा करने के लिए लम्बी -सी दीवार, उत्तर से आते खानाबदोशों रोकने के लिए,  बनवाने का सुविचार आया था।  
जब बैठक शुरू हुई तो सुदूर पहाड़ों से आये एक प्रसिद्द मुनि भी उपस्थित होने के लिए आमंत्रित था। तब उससे भी पूछा था कि हमारी  भूमि विदेशी आक्रामकों से कैसे बचाई जाए ?
मुनि चिंतन में डूबकर देर तक सोचता रहा और तत्पश्चात अपना सुझाव प्रस्तुत किया :
महाराज,  मैं ऐसा सोचता हूँ  आपको एक ऐसी स्त्री खोजनी  पड़ेगी,  जिसका इकलौता  पुत्र  हो  , जो  जवान  और  अत्यंत सुन्दर हो,  जो  अपनी माँ के लिए
आँखों की रौशनी हो , जिसका  स्वास्थ उत्तम हो।  उसी स्त्री से पूछना आवश्यक है कि क्या वह अपने पुत्र को देश की भलाई के लिए समर्पित कर सकती है ? यदि उसकी तरफ से सहमति मिलेगी, तब उसे सच सच  बताना कि उसके बेटे का रक्त  देश की भलाई के नाम पर  वेदी पर से बहाया जाएगा – वह ज़िंदा  बनाई जा  रही दीवार में चुनाया  जाएगा।  
बीच में रूककर ज़ि  चुन लोटा मुंह से लगा दिया और थोड़ा सा पानी  पीकर ज़मीन पर रख दिया।  
बाद में क्या हुआ, अब सुनो बेटे।  
इवान सुनने में अत्यंत मग्न था। वह बड़े श्रद्धा के साथ पिता जी का कथन  सुन रहा था।  
-मुनि का उत्तर सुनने के पश्चात महाराज ऐसे लड़के को ढूंढने के लिए देश के कोने कोने सन्देशवादकों  को भेजने का आदेश सुनाया।  
आखिर काफी समय ढूंढने के बाद  ऐसा ही लड़का मिल गया।  
वह सुन्दर युवक अपने को देश की भलाई और सुरक्षा  हेतु समर्पित करने के लिए तैयार था।  
कुछ दिन बाद वह अपनी माता जी लेकर राजभवन आया था ।  महाराज ने उनका स्वागत किया और दोनों को पास में बैठने  को कहा।  एक तरफ युवक अपनी माँ के साथ बैठा  था , बीच में सिंहासन पर स्वयं शासक,  और दूसरी ओर शांत भाव के साथ प्रार्थना  में डूबा देश का सबसे बड़ा मुनि।  उनके बीच में एक गुप्त परामर्श  हुआ  जिसके बाद वे सब दीवार की तरफ चल  निकले।  संध्या के वक़्त वे थके गंतव्य पहुँच गए।  
युवक को  चीन की  दीवार का निर्माण नज़र में आया।  उसके लिए एक ऐसी  जगह  बनाई थी जहां उसे खड़े रहने का आदेश दिया था।  वह ईंटों के बीच में खड़ा किया था।  निर्माताओं ने ईंटों को लाकर एक दुसरे पर रखने लगे थे । युवक

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लगाए रहे ईंटों के बीच में खड़ा रहा और रोने की बजाय वह इस दुनिया की खूबसूरती के बारे में देशभक्ति गाने गा रहा था।  पास में लोग अचम्भित हुए खड़े थे , उनके आंसू  बह रहे थे , बूढ़े बूढ़ियों को इतना देशप्रेम और इतनी बहादुरी पहले कभी नहीं देखी थी।  जब उसी देशभक्त का पूरा -सा शरीर ईंटों में बंद किया गया था और सिर्फ उसका चाँद- सा रोशन चेहरा दिखाई दे रहा था, उसकी माँ अलविदा कहने के लिए बुलाई गयी।  
इवान चिंता से कांप रहा था , उसका चेहरा पीला पड़ गया, मुँह खुला था और गालों पर आंसू बह रहे थे।  
-अब सुनो बच्चे, बाद में क्या हुआ।  
दीवार के पास अधेड़ उम्र की महिला आ गई , युवक गले में लेकर उसे अपना अंतिम आशीर्वाद दिया।  दोनों चुप थे।  न महिला, न उसका बेटा चिंता नहीं दिखा रहे थे।   दोनों शांत भाव व्यक्त करते हुए कुछ देर तक आपस में नज़रों से बातें करते रहे जिसके बाद महिला मुड़कर सिर नीचे किये नम्रता के साथ रवाना हो गयी कि अचानक मुनि जी ने ऊंचे स्वर में ऐलान किया :- ” इस  वीर को मुक्त  कर दे! वह  देशभक्ति की  परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ ।  और लोगों, मेरी बात कान खोलकर सुन लो , जब तक इस देश में ऐसी माताएं रहेंगी ,जब तक ऐसे वीर मिलते रहेंगे, जो देश के  नाम पर ,मातृभूमि के नाम पर  अपना जीवन स्वतंत्रता की वेदी पर चढ़ा सकते हैं, तब तक कोई भी शत्रु इस दीवार को कभी भी पार नहीं कर सकेगा !”
ज़ि चुन उठ खड़े हुए बोले : बेटे, वैसा ही हमारा पवित्र कलीसिया है-जब तक ऐसे वीर हमारे बीच  में रहेंगे ,तक तक कोई भी दुश्मन इसे क़ब्ज़े में कभी  भी,किसी भी हाल में नहीं ले पायेगा , तब तक वह अटूट खड़ा रहेगा। आशा है तुम मेरी बात  समझते हो, न?”
-” जी हाँ , पिताजी “‘- इवान फुसफुसाते बोला ,-” आशीर्वाद दे ”  !

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१० जून  १९०० की शाम थी।  १० बज गए पर शहर इतनी रात नहीं सो रहा था।  पूरे बीजिंग में बग़ावत की बू फैली हुई थी।  उस वक़्त ज़ि चुन के घर पर  तक़रीबन ७० मसीही प्रार्थना के लिए इकट्ठे हुए थे कि बॉक्सर – बग़ावत  में  भाग लेनेवालों ने याजक के मकान घेर लिया।  
एक दिन पहले नगर की सभी दीवारों, खम्बों पर मसीहियों के खिलाफ , मसीहियों को फंसाने के और हवाले करने के,  तथा उन गद्दारों को, जो मसीहियों को अपने घर पर शरण देते हैं, मौत की सजा की धमकी के  इश्तहार लगाए गए थे।  
उस रात हिंसक भीड़ मसीहियों की तलाशी में थी , क्रोध से भरे बॉक्सर पकडे हुए मसीहियों को अनदेखी क्रूरता के साथ मारते थे : शिशुओं को , महिलाओं को , बूढ़ों को, सभी को, जो स्वयं  मसीही था या मसीहियों से कोई न कोई  संपर्क रखनेवालों  को मौत की सजा मिलती थी। बगावत करनेवालों की भीड़ को क्रोध की सीमा न रही।  वे चाहते थे कि हर मसीही अपना धर्म त्याग कर ले।  उन दिनों की घटना हमें रोमन साम्राज्य के ज़माने के  पहले शहीदों के शौर्य  को याद दिलाती है।  
मृत्यु या आनेवाली शारीरिक यंत्रणाओं के डर के मारे बहुत सारे चीनी ऑर्थोडॉक्स  अपना धर्म, अपना भगवान् को त्याग करते थे और चीन के लोक धर्मों की झूठी प्रतिमाओं  की पूजा  करने के लिए तैयार रहते थे। मगर सच्चे दिल से  ऐसे विश्वास करनेवालों की कमी बिलकुल  नहीं थी , जो  अपनी जान मसीह के नाम पर दे सकें ।  बगावत के सभी दिनों के दौरान मसीहियों के विरुद्ध षड्यंत्र, झूठे बेबुनियादी आरोप, अत्याचार जारी रही।  किन्तु सच्चे प्रभु के सच्चे भक्त कदापि हरनेवाले नहीं थे , उन  सभी के लिए प्राचीन समय के शहीद आदर्श बने थे।  
जब हमला शुरू  हुआ,  तब घिरे हुए घर में से फरार करना लगभग असंभव हो गया  , यद्यपि अनेक लोग वहाँ से  बच निकले।  अधिकतर लोग,  जो  वहाँ से नहीं निकल पाए  वे स्त्रियां और बच्चे थे।  उन बंदियों में ज़ि चुन  भी  शामिल था।  अपने घर, जो अब दूसरों के लिए एक दुर्ग का काम करता था , के आंगन में बैठा हुआ और जले हुए गिरजाघर की तरफ करुणा के साथ देख रहा  था।  

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